श्वेत कपास से लदे ये चिनार
झुके हुए से करते कुछ आभार
झुके हुए से करते कुछ आभार
करते कुछ आभार
हिम पथ पर जाती, इक काली सी कतार
ठगा खड़ा सोचता, किसके पद चिन्हों का ये भार
कभी तो चलती थी, यहाँ मस्त मंद बयार
कभी चहुँ ओर खिली, प्रिय बसंत बहार
देखता आज यहाँ, दिन होते तार-तार
जीवन की इस राह में, क्यूँ लगता सब बेज़ार
सुख साधन सभी, मगर लगते सब बेकार
दे सकता इस एकाकी में गर्माहट, यदि कोई
तो सिर्फ दोस्तों का प्यार, सिर्फ अपनों का प्यार
Dedicated to all my friends..........
Grateful to Almighty for his creation, called friendship.
Thank all my friends, for their warmth.

